कांग्रेस बनाम बीजेपी: मोदी को गाली पर गरमाई सियासत”

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भारतीय राजनीति में तीखी बयानबाज़ी कोई नई बात नहीं है। चुनावी रैलियाँ हों, टीवी डिबेट्स हों या सोशल मीडिया—कड़े शब्द अक्सर सुनाई देते हैं। लेकिन जब बात सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाली देने या अपमानजनक भाषा इस्तेमाल करने तक पहुँचती है, तो बवाल तय है। कांग्रेस के कुछ नेताओं की तीखी टिप्पणियों पर बीजेपी का कड़ा विरोध, फिर उस पर पलट-वार—यह सिलसिला बार-बार दोहराया जाता है। सवाल यही है कि इस “बोल-बचन की लड़ाई” का लोकतंत्र, जनता और असली मुद्दों पर क्या असर पड़ता है?

1) राजनीति में भाषा का स्तर क्यों महत्वपूर्ण है

लोकतंत्र में असहमति जरूरी है। सरकार की आलोचना लोकतंत्र की सेहत का संकेत है। पर शब्दों की मर्यादा भी उतनी ही जरूरी है। नेता जब गाली या निजी हमलों का सहारा लेते हैं, तो बहस “नीतियों बनाम नीतियों” से हटकर “व्यक्ति बनाम व्यक्ति” बन जाती है। इससे न केवल राजनीतिक संस्कृति का स्तर घटता है, बल्कि युवाओं में यह संदेश जाता है कि बहस जीतने का तरीका शिष्टाचार नहीं, बल्कि शोर और शर्मनाक शब्द हैं।

2) कांग्रेस का नज़रिया: “कड़ी आलोचना बनाम असम्मान”

कांग्रेस का तर्क रहता है कि वह सरकार की नीतियों—महंगाई, नौकरियाँ, किसानों की आय, संस्थाओं की स्वतंत्रता—पर कड़ी भाषा में सवाल उठाती है। कई नेताओं का मानना है कि जब जनता नाराज़ है, तो भाषणों में तीखापन स्वाभाविक है। वे कहते हैं कि “कठोर शब्द” कभी-कभी सत्ता को आईना दिखाने का तरीका बन जाते हैं। पर यही वह बिंदु है जहाँ “कठोर आलोचना” और “गाली” की रेखा धुंधली हो जाती है। कुछ नेता भावनाओं में बहकर उस रेखा को पार कर देते हैं, जिसके बाद विपक्ष का संदेश कमजोर पड़ता है और मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

3) बीजेपी की प्रतिक्रिया: पद की गरिमा और राजनीतिक मर्यादा

बीजेपी का कहना है कि प्रधानमंत्री देश का निर्वाचित प्रतिनिधि और संस्था का प्रतीक हैं। इसलिए उनके खिलाफ गाली देना सिर्फ़ एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि पद की गरिमा का हनन है। बीजेपी इसको “विचार-विहीन राजनीति” बताती है—मानो विपक्ष के पास ठोस तर्क या वैकल्पिक रोडमैप नहीं, इसलिए वह व्यक्तिगत हमलों का सहारा लेता है। पार्टी इस मुद्दे को नैतिक सवाल के रूप में उठाती है और जनभावनाओं को “मर्यादा बनाम अभद्रता” के पैमाने पर जोड़ने की कोशिश करती है।

4) मीडिया और सोशल मीडिया: आग में घी

टीवी डिबेट्स में क्लिप-कटिंग, तेज़ हेडलाइन और वायरल ट्रेंड—ये सब मिलकर विवाद को दस गुना बढ़ा देते हैं। X (ट्विटर), फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर कुछ सेकंड के छोटे वीडियो, मीम्स, और हैशटैग एक ही बयान को राष्ट्रीय बहस बना देते हैं। इसकी अपनी राजनीति है—समर्थक अपने-अपने “नैरेटिव” को आगे बढ़ाते हैं, और एल्गोरिद्म वही सामग्री धकेलते हैं जो गुस्सा या उत्तेजना पैदा करे। नतीजा: ठंडी-ठंडी तथ्यों वाली चर्चा की जगह गरमागरम शब्दों का तूफ़ान।

5) कानून और मर्यादाएँ: सीमा कहाँ खींची जाए?

भारत का संविधान अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है, पर निरंकुश आज़ादी नहीं। अपमान, मानहानि, और घृणा फैलाने जैसी श्रेणियाँ कानून के दायरे में आती हैं। सार्वजनिक पदधारियों के विरुद्ध अभद्र भाषा पर चुनाव आयोग, सदन की आचार समिति या पार्टी हाई-कमान भी कार्रवाई कर सकते हैं। कई बार नेता बाद में बयान “वापस” लेते हैं या “माफी” माँगते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि भाषा की गलती राजनीतिक रूप से महँगी पड़ सकती है।

6) जनता पर असर: नाराज़गी, ध्रुवीकरण और निराशा

आम मतदाता राजनीति से समाधान चाहता है—रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कीमतें, सुरक्षा। लेकिन जब बहस गाली-गलौज में फँस जाती है, तो जनता दो हिस्सों में बंटती चली जाती है: अपने-अपने खेमे के बचाव में खड़ी भीड़ और राजनीति से निराश “साइलेंट मेजॉरिटी”। ध्रुवीकरण बढ़ने से पार्टियाँ अपनी “बेस” को तो ऊर्जा देती हैं, पर “मिडिल ग्राउंड”—यानी वे लोग जो मुद्दे देखकर वोट करते हैं—अकसर दूरी बना लेते हैं। यही वह तबका है जो चुनावों में निर्णायक साबित होता है।

7) इतिहास बताता है: तीखे शब्द उल्टा वार भी बनते हैं

भारतीय राजनीति में पहले भी कई विवादास्पद टिप्पणियाँ हुईं। अनुभव यह कहता है कि निजी हमले अल्पकाल में सुर्खियाँ दिला सकते हैं, पर दीर्घकाल में अक्सर “बूमरैंग” सिद्ध होते हैं। विपक्ष अगर ठोस नीति-आधारित आलोचना पर टिके, डेटा से तर्क दे, और वैकल्पिक समाधान पेश करे, तो उसे नैतिक बढ़त मिलती है। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष भी जब विपक्ष पर पलटवार में निजी तंज़ को प्राथमिकता देता है, तो शासन के काम-काज पर संवाद कमजोर होता है।

8) पार्टियों की अंदरूनी राजनीति: “हाई-कमान” का इम्तिहान

जब भी कोई नेता सीमा लांघता है, पार्टी नेतृत्व पर दबाव बढ़ता है—क्या कार्रवाई होगी? चेतावनी, निलंबन, या स्पष्टीकरण? अंदरूनी संदेश यह जाता है कि मंच पर “फ्रेमिंग” कितनी जरूरी है। एक खराब चुना गया शब्द महीनों की मेहनत पर पानी फेर सकता है। रैलियों में भाषण लिखने/जाँचने की प्रक्रिया, सोशल मीडिया पोस्ट की “फैक्ट-एंड-टोन” स्क्रीनिंग, और प्रवक्ताओं का ट्रेनिंग—ये सब पेशेवर राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं।

9) क्या “कठोर” हुए बिना असरदार विरोध संभव है?

बिल्कुल। कड़ी आलोचना और गाली में फर्क है। कड़ी आलोचना में—

  • नीतियों की स्पष्ट समीक्षा: क्या वादा किया था, क्या हुआ?

  • आँकड़ों का सहारा: बजट, रिपोर्ट, जवाबदेही।

  • मानवीय कहानियाँ: किसान, मजदूर, छोटे व्यापारियों के अनुभव।

  • व्यावहारिक विकल्प: “हम आते तो कैसे करते?”

जब विपक्ष इस ढाँचे में बात करता है, तो जनता को दिशा दिखती है। वहीँ, सत्ता पक्ष भी इस तरह की बहस का स्वागत करे तो नीति-निर्माण बेहतर होता है।

10) चुनाव और “नैरेटिव”: भाषा से बनती-बिगड़ती तस्वीर

चुनावों में कहानी जीतती है—और भाषा कहानी गढ़ती है। अगर चर्चा “विकास बनाम विकास” की हो, तो मतदाता विकल्पों को तौलता है। पर चर्चा “असम्मान बनाम गरिमा” पर सिमट जाए, तो भावनाएँ तर्क पर भारी पड़ती हैं। अक्सर देखा गया है कि अपमानजनक शब्दों का मुद्दा हफ्तों तक चलता है, क्लिप बार-बार बजती है, और विपक्ष की असली बात—रोज़गार, महंगाई, स्वास्थ्य—दबी रह जाती है। इसलिए जो भी पार्टी “इश्यू-सेंट्रिक” चुनाव लड़ना चाहती है, उसे भाषा में अनुशासन रखना ही होगा।

11) सोशल मीडिया पर आपकी भूमिका: नागरिक का “लाइक” भी वोट जैसा

नागरिक सिर्फ़ मतदाता नहीं, वह ऑनलाइन कंटेंट का “एडिटर” भी है। जो हम लाइक-शेयर करते हैं, वही और लोगों तक जाता है। अगर हम भी सिर्फ़ तीखे, अपमानजनक कंटेंट को बढ़ावा देंगे, तो प्लेटफ़ॉर्म वही परोसेंगे। इसलिए ज़रूरी है कि हम तथ्यपरक, शांत और समाधान-मुखी सामग्री को बढ़ावा दें। लोकतंत्र सिर्फ़ नेताओं से नहीं, नागरिकों की डिजिटल आदतों से भी बनता-बिगड़ता है।

12) आगे का रास्ता: गरिमा के साथ असहमति

  1. मर्यादित भाषा: निजी हमलों से बचें; नीति पर चोट करें, व्यक्ति पर नहीं।

  2. तथ्य और वैकल्पिक रोडमैप: सिर्फ़ “क्यों गलत” नहीं, “कैसे बेहतर” भी बताइए।

  3. त्वरित सुधार: कोई सीमा लांघे तो तुरंत स्वीकारें, ठीक करें, माफी माँगें।

  4. प्रशिक्षण और जाँच: प्रवक्ताओं/उम्मीदवारों के लिए टोन-गाइडलाइन, भाषण-स्क्रीनिंग।

  5. जनता से जुड़ाव: बहस को ज़मीन के मुद्दों पर टिकाए रखें—रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों का जीवन, छोटे व्यवसाय की चुनौतियाँ।

निष्कर्ष

“मोदी को गाली” जैसे विवाद तात्कालिक राजनीति में सुर्खियाँ जरूर देते हैं, पर लोकतांत्रिक संवाद की गुणवत्ता घटा देते हैं। कांग्रेस हो या बीजेपी—दोनों के लिए बेहतर यही है कि वे असहमति को गरिमा के साथ व्यक्त करें। देश की जनता बहस चाहती है, लेकिन वह ऐसी बहस चाहती है जो उसके जीवन को बेहतर बनाने वाले समाधान सुझाए। चुनावी राजनीति में कड़वे शब्दों से तालियाँ मिल सकती हैं, पर टिकाऊ विश्वास तभी बनता है जब भाषा में सलीका हो, तर्क में मजबूती हो, और मंशा में जनता का भला हो। यही लोकतंत्र की असली खूबसूरती है—कठोर सवाल, साहसी जवाब, और शालीन भाषा।

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