भारत की धरती हमेशा से ही राजाओं, संतों और वीर योद्धाओं की गाथाओं से भरी रही है। इन्हीं में से एक नाम है राजा भरथरी का। उनकी कहानी रहस्य और शिक्षा से भरी हुई है। यह केवल एक राजा की कथा नहीं है, बल्कि जीवन के सच और त्याग का संदेश देती है।
राजा भरथरी कौन थे?
राजा भरथरी उज्जैन के शासक थे। उज्जैन उस समय एक बहुत समृद्ध नगर माना जाता था। राजा भरथरी, प्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे। वे बहुत पराक्रमी, न्यायप्रिय और प्रजा के हित में सोचने वाले शासक माने जाते थे।
राजा भरथरी के जीवन में सब कुछ था – शक्ति, धन, राजपाट, प्रजा का सम्मान और रानी पिंगला जैसी सुंदर पत्नी। वे अपनी रानी से बहुत प्रेम करते थे। लेकिन कहते हैं कि जीवन की असली परीक्षा तभी आती है जब सब कुछ अच्छा चल रहा हो।
साधु और अमर फल की कहानी
एक दिन एक साधु उनके दरबार में आया। उस साधु ने कठोर तपस्या की थी और वह एक दिव्य फल लेकर आया था। उसने राजा भरथरी को वह फल देते हुए कहा –
“राजन! यह कोई साधारण फल नहीं है। इसे जो खा लेगा, वह अमर हो जाएगा। उसे कभी मृत्यु का भय नहीं रहेगा।”
राजा भरथरी बहुत प्रसन्न हुए। लेकिन साधु ने यह भी कहा कि इस फल को आप उसी को दें, जिसे आप सबसे अधिक प्रेम करते हों।
राजा ने बिना कुछ सोचे-विचारे वह फल अपनी पत्नी रानी पिंगला को दे दिया, क्योंकि वे उनसे सबसे ज्यादा प्रेम करते थे।
रानी का रहस्य
लेकिन असली रहस्य तो यहीं छुपा था। रानी पिंगला किसी और से प्रेम करती थी। उसने वह अमर फल अपने प्रिय को दे दिया।
रानी का प्रिय व्यक्ति भी किसी और स्त्री के मोह में फंसा हुआ था। उसने वह फल एक नर्तकी को भेंट कर दिया।
अंततः वह नर्तकी उस फल को राजा भरथरी के दरबार में लेकर आई और बोली –
“महाराज! यह दिव्य फल है। मैं इसे आपको भेंट करती हूँ।”
राजा ने जब वह फल देखा, तो वे हैरान रह गए। उन्होंने पहचान लिया कि यह वही फल है, जो उन्होंने अपनी पत्नी को दिया था। अब राजा को सारी सच्चाई समझ आ गई।
राजा का दुख और त्याग
रानी पिंगला के विश्वासघात ने राजा भरथरी का हृदय तोड़ दिया। उन्हें यह समझ आया कि इस दुनिया में मोह, प्रेम और ऐश्वर्य सब नश्वर हैं। इंसान चाहे कितनी भी बड़ी चीजों पर गर्व करे, अंत में सब माया ही साबित होती है।
राजा भरथरी ने उसी समय फैसला लिया कि वे इस धोखेबाज़ दुनिया को छोड़ देंगे। उन्होंने अपना राजपाट, ताज और धन-दौलत सब छोड़ दिया। वे सन्यासी बन गए।
भिक्षु भरथरी
राजा भरथरी ने जंगलों में भटककर तपस्या शुरू कर दी। वे साधु-संतों की तरह भिक्षा लेकर जीवन यापन करने लगे। लोग उन्हें “भरथरी बाबा” के नाम से जानने लगे।
उनकी साधना इतनी गहरी थी कि आज भी भारत के कई हिस्सों में उनकी गाथाएँ सुनाई जाती हैं। लोकगीतों और भजनों में उनकी कहानी गाई जाती है। कई स्थानों पर भरथरी बाबा के मंदिर और आश्रम भी बने हुए हैं।
राजा भरथरी की शिक्षा
राजा भरथरी की कहानी सिर्फ एक कथा नहीं है, बल्कि यह हमें कई गहरी बातें सिखाती है।
मोह-माया नश्वर है – चाहे कितना भी वैभव, धन या सुंदरता हो, यह सब टिकता नहीं।
विश्वास सबसे महत्वपूर्ण है – अगर विश्वास टूट जाए तो जीवन का आधार भी खत्म हो जाता है।
त्याग ही सच्चा बल है – राजा भरथरी ने सिंहासन छोड़कर साधना को चुना। यह त्याग सबसे बड़ा साहस था।
सच्चा सुख भक्ति में है – राजपाट में उन्हें शांति नहीं मिली, लेकिन साधना में उन्होंने सच्ची शांति पाई।
जीवन का असली उद्देश्य – इंसान को परमात्मा और आत्मा की ओर ध्यान देना चाहिए, न कि केवल भौतिक सुखों की ओर।
लोककथाओं में भरथरी
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी राजा भरथरी की कहानी सुनाई जाती है। मेले और उत्सवों में उनके भजनों और लोकगीतों की गूंज सुनाई देती है। लोग मानते हैं कि अगर कोई मन से भरथरी बाबा को याद करे तो उसे जीवन के दुखों से मुक्ति मिल सकती है।
कई स्थानों पर भरथरी बाबा के मेले भी लगते हैं, जहाँ लोग भक्ति और आस्था से उनका गुणगान करते हैं।
निष्कर्ष
राजा भरथरी की रहस्यमयी कहानी हमें यह समझाती है कि संसार का सुख केवल क्षणिक है। मोह, प्रेम और वैभव सब धोखा दे सकते हैं। असली शांति और सुख त्याग, भक्ति और ज्ञान में छिपे हैं।
राजा भरथरी ने हमें यह सिखाया कि इंसान चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, अगर वह मोह-माया में बंधा रहेगा तो दुख पाएगा। लेकिन अगर वह त्याग और भक्ति के मार्ग पर चलेगा, तो उसे परम शांति मिलेगी।
इसलिए उनकी गाथा आज भी लोगों के दिलों में जीवित है।
